ख़ुशी

This is completely effect of over reading Mirza Ghalib ji and Faiz Ahmed ji. Cant think more than 4 lines.
Hope you ll like this one.

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ज़िन्दगी

कितना वक़्त गुज़र गया पर आज भी तेरे और मेरे मिज़ाज़ नहीं मिलते हैं, ऐ ज़िन्दगी, चल, तू भी बेशर्म है तो मैं भी ढीठ कम नहीं।

तानें!!

बरसात नहीं हुई तो तेरा हाल पूँछ बैठे, ऐ शहर, तेरे दामन में समंदर है, पानी क्यू नहीं, तीखें लहरों का ज़वाब कुछ यूं आया, तेरी बाहों… Read more “तानें!!”

हिसाब

जाने कहाँ मिलते हैं अतीत और आज के पन्ने, ऐ कलम मुझे भी बता दे, कुछ पुराने हिसाब हैं जिन्हें चुकता कर दूं, आज भी आंखों में… Read more “हिसाब”

यादें

तेरी यादों के ज़ख्म भरने लगते, कोई याद पुरानी कुरेद जाती है, कोई समझे की ये जगह महलों की नहीं, एक लहर और बस रेत रह जाती… Read more “यादें”